Wednesday, 6 November 2013

कर्मयोग रहस्य ३

यदृच्छालाभसंतुष्टो द्वन्द्वातीतो विमत्सरः। 
समः सिद्धावसिध्दौं च कृत्वापि न निबध्यते।।

जो स्वतः होने वाले लाभ से संतुष्ट रहता है , जो द्वंद्व से मुक्त है और ईर्ष्या नहीं करता , जो सफलता तथा असफलता दोनों में स्थिर रहता है , वह कर्म करता हुआ भी कभी बँधता नहीं। 


  

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