Thursday, 28 November 2013

पाँच कर्म के कारण

अधिष्ठानं तथा कर्ता करणं च पृथग्धिम्। 
विविधाश्च पृथक्चेष्ठा दैवं चैवात्र पञ्चमम्।।

कर्म का स्थान (शरीर ), कर्ता , विभिन्न इन्द्रियाँ , अनेक प्रकार की चेष्टाएँ तथा परमात्मा - ये पाँच कर्म के कारण हैं। 

(With the help of these five factors, all actions are effected:) 
The body, ego (in the form of the knot of spirit and matter), the separate senses, the different endeavors, and destiny, or the intervention of the Supreme Universal Controller. 

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