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Tuesday, 24 December 2013

सात्त्विक त्याग


कार्यमित्येव यत्कर्म नियतं क्रियतेअर्जुन। 
सङ्गं त्यक्तवा फलं चैव स त्यागः सात्त्विको मतः।।

हे अर्जुन ! जब मनुष्य नियत कर्तव्य को करणीय मान कर करता है तथा समस्त भौतिक संगति और फल की आसक्ति को त्याग देता है , तो उसका त्याग सात्त्विक कहलाता है। 

O Arjuna, one who performs routine works as a matter of duty, and abandons attachment and fruitive desire such a person performs renunciation of the nature of goodness. This is My opinion. 

Monday, 16 December 2013

निर्दिष्ट कर्तव्यों को कभी नहीं त्यागना चाहिये


नियतस्य तु सन्यासः कर्मणो नोपपद्यते। 
मोहात्तस्य परित्यागस्तामसः परिकीर्तितः।।

निर्दिष्ट कर्तव्यों   को कभी नहीं त्यागना चाहिये। यदि कोई मोहवश अपने नियत कर्मों का परित्याग कर देता है , तो ऐसे त्याग को तामसी कहा जाता है। 

Renunciation of one's daily duties is never desirable. To abandon routine duties out of delusion is false renunciation, or renunciation of the nature of ignorance. 

Thursday, 10 October 2013

भोगी और त्यागी

दुनिया मे दो तरह के लोग मुख्यत पाये जाते हैं. पहला सब कुछ पकडने वाला, जिसे हम भोगी कहते है. इस तरह  भोगी सब कुछ जो कि अपनाने लायक ना हो वे उसको भी अपना लेते है . कूडा भी संभाल कर रख लेते है शायद बाद मे काम आयेगा. जबकि दूसरी तरफ वे लोग जो सब कुछ छोडने वाले होते हैं जिन्हे हम त्यागी कहते है. त्यागी भी भोगियो से पृथक नही है बल्कि उल्टा खडे हो कर शीर्षाशन कि मुद्रा मे है. वे उस को भी त्याग देते है जो कि अपनाने योग्य है.

दोनो ही अविवेकी है- भोगी भी और त्यागी भी! भोगी का अविवेक है वह सोचता है जो भी है उसे पकड लो.  क्या असत्य को पकड ले? त्यागी का अविवेक है जो कहता है जो भी है फेंक दो. क्या सत्य को भी फेंक दे? 

गीता इन प्रश्नों के समाधान का मार्ग प्रशस्त करती है और वह मार्ग है निष्काम कर्म का जिसमे आप कर्म करते हुये भी कर्म मे लिप्त नही होते है. यह रास्ता भोग और त्याग की ओर नही बल्कि हमे सदुपयोग की ओर ले जाता है.